हमारी बेड़ियाँ - हिन्दुओं के लिए नयी सोच जरूरी

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हिन्दू धर्म की पहचाने बन बैठे लोग और संगठन जो हिन्दू धर्म रुपी थाली परोसते हैं, वह मुझे देखने और चखने में भले ही बहुत अच्छी लगे, परन्तु मैं उसे खा नहीं सकता.

बुजदिलों ने हिन्दू धर्म की लगाम अपने हाथ ले कर उसे कायरों की सोच से ओत-प्रोत कर दिया है. उनकी परोसी थाली खाने से मैं कायर हो जाऊंगा और मेरे शरीर की शक्ति भी जाती रहेगी. दुनिया बड़ी जालिम है. गाँधी जी जैसे थप्पड़ के लिए गाल सामने करने को बोलते थे, वे सब किताबी बातें है. कोई गाल सामने करे तो इस जालिम दुनिया में सुबह से शाम तक पिटेगा. मेरी हिन्दू धर्म की परिभाषा अलग है. मैं उसी पर चलता हूँ. आप भी मेरे इस सोच पर चिंतन करें और टिपण्णी करें. इस विषय पर वार्तालाप होना अब नितांत आवश्यक हो गया है.

हिंदुस्तान के राजा धर्म के राह पर चलते थे! रात के वक्त लड़ाई नहीं होती थी. दिन ढलने के बाद अपने शत्रु को भी सहायता देते थे. कोई आत्मसमर्पण कर दे तो उसे क्षमा कर देते थे. महमूद गज़नी ने जब हिंदुस्तान पर आक्रमण किया तो इन धर्म पालन करने वाले राजाओं की ऐसी की तैसी कर दी. पृथ्वीराज चौहान की कहानी सभी जानते हैं. मोहम्मद घोरी को बार बार क्षमा करने वाला अंत में उसी घोरी के हाथों मरा !

आप जहाँ रहते हैं वहीँ अपने मोहल्ले को देख कर अपनी नियम बनाइये. चलिए कुछ ठोस उदाहरण देता हूँ: भगवान् एक है ना ? अलग अलग धर्म इसे कैसे देखते हैं..... इस्लाम: ला इलाही ईल अल्लाह, मोहम्मद उन रसूल अल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई भगवान नहीं है. मोहम्मद उस अल्लाह का भेजा फ़रिश्ता है) इसाई धर्म 1st Commandment - I am God, the only God and you shall not place another God beside me. (सिर्फ मैं ही ईश्वर हूँ. मेरे समक्ष किसी और ईश्वर की इबादत ना करो) हिन्दू धर्म इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:॥ (जिसे लोग इन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि कहते हैं, वह सत्य तो केवल एक ही है, भले ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।')

ईश्वर के इस मौलिक परिभाषा में सिख, बौद्ध और जैन रीतियाँ, जो हिन्दू धर्म की प्रतिबिम्ब हैं, वे भी ईश्वर पर किसी नाम को अनिवार्य नहीं मानते. हिंदुस्तान की धरती से जुड़ी सोच में ईश्वर के बाद गुरु की संकल्पना है. फ़रिश्ते, रसूल, पैगम्बर जैसी धारणाएं हमारी धरती के तसव्वुर (संकल्पना) से परे हैं.

दुर्भाग्य से कुछ गदहों ने हिन्दू धर्म की परिभाषा में अपने उलटे सीधे खयालात को इस कदर घुसा दिया की अब हिन्दू धर्म का असल मूल को उनके द्वारा घुसाई गयी बेवकूफियों से अलग कर पाना आम आदमी के लिए कठिन हो गया है. लोग बहुत सारी गलत धारणाओं को ही हिन्दू सोच समझने लगे हैं. इन धारणाओं में सबसे मुख्य है अहिंसा. अहिंसा का हिन्दू धर्म से कोई वास्ता नहीं है. यह एक जैन सोच है जिसे मोहनदास गाँधी वापस हिन्दू धर्म में इस लिए घसीट लाये क्योंकि अंग्रेज़ों से उनके ही बनाये हुए कानून के दायरे में रह कर उनसे निपटने के लिए इस का झंडा ले कर चालना उस समय के लिए चालाकी थी.

दुर्भाग्यवशयह हमारी आदत का हिस्सा बन गयी! आज हिन्दुओं में अहिंसा और उसी से उपजी हुई शाकहारिता की बीमारी ने हिन्दुओं के मनोबल को तोड़ कर रख दिया है. अपने पेट को भरने और अपने जान-माल की हिफाज़त करने के लिए की गयी हिंसा सर्वथा जायज़ है. यह बात आज के युग में कुछ हिन्दुओं की मोटी खोपड़ी में घुसनी अनिवार्य है वर्ना हिन्दू धर्म बिना नख और दन्त वाला साग खाने वाला शेर बना रहेगा. और इसी धर्म के लोग इसके दायरे से निकल कर नख और दन्त उगा कर इसके शरीर को नोचते रहेंगे जैसा की दो हज़ार सालों से होता आ रहा है.

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